तसवफ़ – तसव्वुफ़ क्या है ?
सूफ़ी, शरीअत के ज़ाहिरी अरकान के साथ साथ बातिनी अरकान भी अदा करते हैं। इस ज़ाहिरी और बातिनी शरीअत के मेल को ही तसव्वुफ़ कहते हैं।
यही पूरे तौर पर इस्लाम है, यही हुजूर ﷺ की मुकम्मल शरीअत है। क्योंकि इसमें दिखावा नहीं है, फरेब नहीं है। इसमें वो सच्चाई वो हक़ीक़त वो रूहानियत समाई हुई है जो हज़रत मुहम्मद ﷺ को रब से अता हुई, जो हर पैगम्बर अपने सीने में लिए हुए है।
इसी तसव्वुफ़ को सीना ब सीना, सिलसिला ब सिलसिला, सूफ़ी अपने मुरीदों को अता करते हैं। और रब से मिलाने का काम करते हैं। यहां हम उसी तसव्वुफ़ के बारे में बुजुर्गों के क़ौल का तज़किरा कर रहे हैं।
यही पूरे तौर पर इस्लाम है, यही हुजूर ﷺ की मुकम्मल शरीअत है। क्योंकि इसमें दिखावा नहीं है, फरेब नहीं है। इसमें वो सच्चाई वो हक़ीक़त वो रूहानियत समाई हुई है जो हज़रत मुहम्मद ﷺ को रब से अता हुई, जो हर पैगम्बर अपने सीने में लिए हुए है।
इसी तसव्वुफ़ को सीना ब सीना, सिलसिला ब सिलसिला, सूफ़ी अपने मुरीदों को अता करते हैं। और रब से मिलाने का काम करते हैं। यहां हम उसी तसव्वुफ़ के बारे में बुजुर्गों के क़ौल का तज़किरा कर रहे हैं।
हज़रत दाता गंजबख़्श
रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं
दीने मुहम्मदी, दुनियाभर में सूफ़ीया किराम की बदौलत फैली। आज भी अगर इन्सान को सुकूने कल्ब चाहिए तो सूफ़ीयों की बारगाह में आना ही पड़ेगा। और ऐसा हो भी रहा है। लोग सूफ़ीयों की ख़ानक़ाहों में रब की तलाश कर रहे हैं और जो यहां नहीं आ पा रहे हैं, तो वो जुनैद बग़दादीؓ, इमाम ग़ज़ालीؓ, इब्ने अरबीؓ, मौलाना जलालुद्दीन रूमीؓ जैसे सूफ़ीयों की किताबों से फ़ायदा उठा रहे हैं।
तसव्वुफ़ के इस उरूजियत को देखकर, अक्सर लोग इस पर तरह तरह के झूठे मनगढ़ंत इल्ज़ामात भी लगाते हैं। यहां तक कहते हैं कि तसव्वुफ़ का इस्लाम से कोई वास्ता नहीं है, क्योंकि हुज़ूरﷺ के ज़माने में ये लफ़्ज़ इस्तेमाल ही नहीं होता था। अगर सिर्फ़ इसी बिना पर, तसव्वुफ़ ग़ैर इस्लामी है, तो फिर कुरान का तर्जुमा व तफ़्सीरें, बुखारी शरीफ़, मुस्लिम शरीफ़, तिरमिजी शरीफ़ जैसी हदीसों की किताबें, फि़क़्ह, मानी व बयान सभी के सभी ग़ैर इस्लामी हैं, क्योंकि ये सब भी हुज़ूरﷺ के दौर में नहीं थी।
उस वक़्त सहाबी, दीन को फैलाने पर ही ज़ोर दे रहे थे। उन्हें किसी और काम की फुरसत नहीं थी। इस दौर के बाद सहाबी, ताबेईन व तबे ताबेईन, इन इल्मों की तरफ़ तवज्जह किए। जिन हज़रात ने कुरान के मानी व मतलब पर काम किया, वो मफु़स्सिरिन कहलाए और इस इल्म को इल्मे तफ़सीर कहा गया। जिन्होने हदीस पर काम किया वो मुहद्दिसीन कहलाए और इस इल्म को इल्मे हदीस कहा गया। जिन्होने इस्लामी कायदा कानून पर काम किया वो फुक़्हा कहलाए और इस इल्म को इल्मे फिक़्ह कहा गया। जिन्होने तज़्कीया ए नफ़्स व रूहानियत पर काम किया वो सूफ़ी कहलाए और इस इल्म को इल्मे तसव्वुफ़ कहा गया।
लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सहाबा किराम इल्म तफ़सीर, हदीस, फिक़्ह व तसव्वुफ़ से बेखबर थे। बल्कि ये कहा जाए कि वे इन सब इल्मों में माहिर थे तो गलत नहीं होगा। हां ये ज़रूर है कि उन्हें मफु़स्सिर या मुहद्दिस या फुक़्हा या सूफ़ी नाम से नहीं पुकारा जाता, लेकिन ये सारी ख़ासियत उनमें मौजूद थी। उस वक़्त हक़ीक़त थी, नाम न था, आज नाम है लेकिन हक़ीक़त बहुत कम है।
सूफ़ी लफ़्ज़ ‘सफ़ा’ से निकला है। और सफ़ा, इन्सानी सिफ़त नहीं है, क्योंकि इन्सान तो मिट्टी से बना है और उसे बिलआखि़र ख़त्म ही होना है। इसके उलट नफ़्स की अस्ल मिट्टी है, इसलिए वो इन्सान से नहीं छुटती। इसलिए नफ़्स का ख़ात्मा और सफ़ा का हासिल करना, बगैर मारफ़ते इलाही के मुमकिन नहीं। बगैर फ़नाहियत के ये हासिल नहीं होती। लेकिन इसके हासिल होने के बाद सफ़ा या नूरानियत, फि़तरत में बस जाती है।
(शरह कशफुल महजूब)
ग़ौसपाक हज़रत अब्दुल क़ादिर जिलानी
रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं-
तसव्वुफ़ تصوف चार हर्फ से मिल कर बना है-
त
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ف
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ते
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स्वाद
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वाव
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फ़े
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लफ्ज़ ‘ते’ (त)
ये तौबा को ज़ाहिर करती है। इसकी दो किस्में हैं एक ज़ाहिरी और दुसरी बातिनी (छिपी हुई)। जाहिरी तौबा ये है कि इन्सान अपने तमाम जाहिरी बदन के साथ गुनाहों और बुरे अख्लाक से बंदगी व फ़रमाबरदारी की तरफ लौट आए और बुरे चाल चलन को छोड़कर अच्छाई को अपना ले।
बातिनी तौबा ये है कि इन्सान अपने छिपे हुए तमाम बूरी आदतों को छोड़कर अच्छी आदतों की तरफ आजाए और दिल को साफ कर ले। जब दिल की सारी बुराई, अच्छाई में तब्दील हो जाए तो ‘ताअ’ का मुकाम पूरा हो जाता है और ऐसे शख्स को ताएब कहते हैं।
लफ्ज़ ‘स्वाद’ स
ये सफा (पाक) को ज़ाहिर करता है। सफा की दो किस्में हैं – कल्बी और सिर्री। सफा ए कल्बी, ये है कि इन्सान नफ्सानियत से दिल को साफ कर ले, दुनिया व दौलत के लालच से बचे और अल्लाह से दूर करनेवाली तमाम चीजों से परहेज़ करे।
इन सारी दुनियावी चीजों को दिल से दूर करना बगैर जिक्रुल्लाह के मुमकीन नहीं। शुरू में जिक्रबिलजहर किया जाए ताकि मुक़ामे हक़ीक़त तक पहुंचा जा सके जैसा कि रब ने फ़रमाया –
सच्चे ईमानदार तो बस वही लोग हैं कि जब (उनके सामने) ख़ुदा का ज़िक्र किया जाता है तो उनके दिल मचल जाते हैं। (क़ुरान 8:2)
यानि उनके दिलों में अल्लाह का खौफ पैदा हो जाए। ज़ाहिर है ये खौफ सिर्फ तभी पैदा हो सकता है जब दिल लापरवाही की नींद से जाग जाए और ज़िक्रे ख़ुदा से दिल का जंग उतार ले।
खशियत (खौफ़) के बाद अच्छाई और बुराई जो अभी तक छिपी होती है, उसकी सूरते दिल पर नक्श हो जाती है जैसा कि कहा जाता है कि आलिम नक्श बिठाता है और आरिफ चमकाता है।
सफाई सिर्री का मतलब ये है कि इन्सान मासिवा अल्लाह को देखने से परहेज़ करे और गैरूल्लाह को दिल में जगह न दे। और ये वस्फ असमा-ए-तौहीद का लिसान बातिन से मुसलसल विर्द करने से हासिल होता है। जब ये तसफिया हासिल हो जाए तो ‘साद’ का मकाम पूरा हो जाता है।
लफ्ज़ ‘वाव’ (व)
ये विलायत को जाहिर करता है और तसफिया पर मुरत्तब होती है।
बेशक अल्लाह के वलियों पर न कुछ ख़ौफ़ है न कुछ ग़म। (क़ुरान 10:62)
विलायत के नतीजे में इन्सान अख्लाके ख़ुदावन्दी के रंग में रंग जाता है। हुजूर ﷺ ने फ़रमाया – अख्लाके ख़ुदावन्दी को अपनाओ।
यानी सिफाते ख़ुदावन्दी से मुतस्सिफ हो जाओ। विलायत में इन्सान सिफाते बशरी का चोला उतार फेंकने के बाद सिफाते ख़ुदावन्दी की खिलअत पहन लेता है।
हदीसे कुदसी में है-
‘जब मैं किसी बन्दे को महबूब बना लेता हूं तो उसके कान बन जाता हूं, उसकी आंख बन जाता हूं, उसके हाथ बन जाता हूं और उसकी जबान बन जाता हूं। (इस तरह) वो मेरे कानों से सुनता है, वो मेरी आखों से देखता है, मेरी ताकत से पकड़ता है, वो मेरी जुबान से बोलता है और मेरे पांव से चलता है।’
जो इस मकाम पर फाएज़ हो जाता है वो गैर-अल्लाह से कट जाता है।
यहां ‘वाव’ का मुकाम मुकम्मल हो जाता है।‘और आप (ऐलान) फ़रमा दीजिए, आ गया है हक़ और मिट गया है बातिल। बेशक बातिल था ही मिटने के लिए’ (क़ुरान 17:81)
लफ्ज़ ‘फ़े’ (फ़)
ये फ़नाफिल्लाह को ज़ाहिर करता है। यानि ग़ैर से अल्लाह में फ़ना हो जाना। जब बशरी सिफ़ात फ़ना हो जाती है तो ख़ुदाई सिफ़ात बाक़ी रह जाती है। और ख़ुदाई सिफ़ात न फ़ना होती है और न फ़साद का शिकार।
हर चीज हलाक होने वाली है सिवाए उसकी ज़ात के। (क़ुरान 28:88)
पस अब्दे फानी-रब-बाक़ी
(रब की रज़ा के साथ बाक़ी रह जाता है।)
बंदा-फानी-का-दिल-सरबानी
(रब की नजर के साथ बाक़ी हो जाता है।)
सारी चीजें फ़ानी है सिवाए उन आमाले सालेहा के जिनको सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए किया जाए। रब का राज़ी-ब-रज़ा होना ही मकामे बक़ा है।
उसकी बारगाह तक अच्छी बातें (बुलन्द होकर) पहुंचतीं हैं और अच्छे काम को वह खुद बुलन्द फ़रमाता है। (क़ुरान 35:10)
जब इन्सान फ़नाफ़िल्लाह के मकाम पर फ़ाएज़ हो जाता है तो उसे आलमे कुरबत में बक़ा हासिल होती है। आलमे लाहूत में, यही अंबिया व औलिया के ठहरने की जगह है। पसन्दीदा मक़ाम में उस सारी कुदरत रखने वाले बादशाह की बारगाह में (क़रीब) होंगे। (क़ुरान 54:55)
ऐ ईमानदारों ख़ुदा से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ। (क़ुरान 9:119)
जब कतरा समंदर से मिल जाता है तो कतरे का अपना वजूद नहीं रहता। किसी शायर ने क्या खूब कहा है- अल्लाह की तमाम सिफ़ात व अफ़आल कदीम में है, जो ज़वाल पज़ीर होने से महफूज़ है। मक़ामे फ़नाहियत में सूफ़ी हक के साथ हमेशा के लिए बाक़ी हो जाता है। वही लोग जन्नती हैं कि हमेशा उसमें रहेंगे। (क़ुरान 2:82)


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