''सूफ़ी'' शब्द ''सुफ'' से बनता है और अरबी भाषा में इसका मतलब ''सुफ्फा'' है, यानी ''दिल की सफाई।'' कुछ लोग इसे फ़ारसी शब्द ''सूफ'' से जोड़ कर 'पश्मीना पोश'' या ''कम्बल जैसा मोटा गरम कपड़ा पहनने वाले' से लेते हैं। तो कुछ इसे 'सफ़' से जोड़कर बताया कि क़यामत के दिन पहली सफ़ (पंक्ति) में जो नेक जन्नती लोग होंगे, ''सूफ़ी हैं।''
''सूफ़ी'' शब्द को ''सूफ़ा'','' सुफाना' और 'सूफ़' के अर्थ में प्रयोग किया गया है। शेख अवुल नस्र सिराज ने लिखा कि ''सूफ़ी अपने ज़ाहिरी लिबास की वजह से सूफ़ी कहलाए। यानी भेड़ों के ऊन के कपड़े पहनना अम्बिया (नबियों), औलिया और सूफियों की ख़ास पहचान रही है।
कुरआन में सूफ़ी
सूफी अल्लाह के वो मख्सूस बन्दे हैं जिन्हें अल्लाह ने अपनी किताब क़ुरआन शरीफ में अलग अलग नामों से याद फरमाया।
जैसे –
जैसे –
o अस्सादेकीन सच्चे
o अस्सादेकात सच्ची औरतें
o अलकानेतीन अदबवाले, फरमाबरदार
o अलकानेतात अदबवाले, फरमाबरदार औरतें
o अलखाशेईन आजीज़ी करने वाले
o अलमोक़ेनीन यक़ीन करने वाले
o अलमुख्लेसीन अख्लास के साथ अल्लाह की बंदगी करने वाले
o अलमोहसेनीन नेकी व एहसान करने वाले
o अलखाएफीन अल्लाह का खौफ रखने वाले
o अर्राजीन उम्मीद रखने वाले
o अलवाजलीन अल्लाह से डरने वाले
o अलआबेदीन इबादत करने वाले
o अस्साएमीन रोज़े रखने वाले
o अस्साबेरीन सब्र करने वाले
o अर्राज़ीन राज़ी ब रज़ा रहने वाले
o अलऔलिया अल्लाह के वली
o अलमुत्तक़ीन तक़वा करने वाले
o अलमुस्तफीन मुन्तखब, चुने हुए
o अलमुजतबीन मुन्तखब किये हुए
o अलअबरार नेकी करने वाले
o अलमुक़रबीन क़ुर्बवाले
o मुशाहेदिन शहादत देने वाला
o अलमुतमईन मुतमईन रहने वाला
पहले सूफ़ी
लोगों के ज़ेहन में हमेशा ये सवाल रहा है कि पहले सूफ़ी कौन हैं ?
कोई हज़रत अबूज़र ग़फ़्फ़ारीؓ को मानते हैं, जिनके लिए सबसे पहले सूफ़ी लफ़्ज़ का इस्तेमाल हुआ। तो कोई हज़रत उवैस करनीؓ को, जिनका मुकाम सहाबियों पर भारी है। तो कोई हसन बसरीؓ को, जो चार पीर में से है। इसमें अलग अलग लोगों की अलग अलग राय है। इस बहस की वजह सिर्फ ‘सूफ़ी’ लफ़्ज़ ही है, क्योंकि ‘सूफ़ी’ लफ़्ज़ हुज़ूरﷺ के वक़्त इस्तेमाल नहीं होता था, बल्कि बाद में होने लगा।
सिर्फ़ रब के खास बंदों के लिए ही सूफ़ी लफ़्ज़ इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि सूफ़ी होने के लिए खास सिफ़तें भी होना ज़रूरी है। तो पहले सूफ़ी की तहक़ीक़ के लिए भी हमें ये देखना होगा कि सबसे पहले वो सिफ़तें किनमें देखी गयी।
सबसे पहले मख्दूम यहया मुनीरीؓ के क़ौल को देखते हैं। वो फ़रमाते हैं कि ‘‘इस कायनात में सबसे पहले सूफ़ी हज़रत आदमؑ हैं। क्योंकि सबसे पहली ख़ानक़ाह यानी काबा, आप ही ने बनाई। ख़िरका भी आप ही से मन्सूब है। आपका गोदड़ी (गुदड़ी) इस्तेमाल करना, आपके नक़्शेक़दम पर चलने वाले पैगम्बर हज़रत नूहؓ, हज़रत मूसाؓ व हज़रत ईसाؓ ने भी अपनाया। हज़रत मूसाؓ व ईसाؓ ने तो सारी उम्र ‘सफू़’ का लिबास पहना और बैतुल मुक़द्दस को ख़ानक़ाह बनाया। हज़रत मुहम्मदﷺ ने भी गोदड़ी और कंबल पहना और मस्जिद नबवी को ख़ानक़ाह बनाया। आप अपने कुछ ख़ास सहाबियों को तसव्वुफ़ व राज़ो नियाज़ की बातें बताते, जो आम लोगों को समझ में ही नहीं आती थी और जब किसी को इज़्ज़त व तकरीम फ़रमाते तो अपनी चादर या कपड़ा इनायत करते। ये ख़ास सहाबी जो तकरीबन 70 थे, हुजूरﷺ की ख़ास पैरवी करने वाले पीर हुए और इन्हें सूफ़ी समझा गया।’’
लेकिन इस बारे हज़रत इश्तियाक़ आलम शहबाज़ीؓ फ़रमाते हैं कि ‘‘जब हम तसव्वुफ़ और सूफ़ीया का असल, किताबो सुन्नत को क़रार दे चुके हैं, तो इस मामले के लिए भी किताबो सुन्नत की तरफ़ ही रूजूअ करते हैं। इससे बेहतर कुछ दूसरा नहीं हो सकता। अल्लाह ने कुरान में फ़रमाया -يَٰٓأَيُّهَا ٱلْمُدَّثِّرُ ‘‘ऐ (मेरे) कपड़ा ओढ़ने वाले (रसूल) उठो !’’ (74:1) और يَٰٓأَيُّهَا ٱلْمُزَّمِّلُ ‘‘ऐ (मेरे) चादर लपेटे रसूल ! (73:1)। ये लिबास अल्लाह के सारे पैगम्बरों और हुज़ूरﷺ का पसंदीदा लिबास रहा है। लेकिन कुरान में ये सिर्फ़ हुज़ूरﷺ के लिए ही कहा जा रहा है। अब आप इसे कंबली कहें या कमली, सफू़ कहें या गोदड़ी, पशमीना का बना कहें या दलक का, बात वही है।’’
सूफ़ी, सफू़ से बना कपड़ा इसलिए नहीं पहनते कि हज़रत आदमؑ ने पहना, बल्कि इसलिए पहनते हैं क्योंकि हुज़ूरﷺ ने पहना है। तन्हाईपसंद व इबादतगुज़ार हैं तो सिर्फ इसलिए कि हुज़ूरﷺ ने ऐसा किया। जो भी बातें सूफ़ी की सिफ़त में शामिल है, वो सारी हुज़ूरﷺ की प्यारी सुन्नतें ही हैं, उनकी प्यारी अदाएं ही हैं। एक सूफ़ी, सारी उन्हीं बातों की पैरवी करते हैं, जो हुज़ूरﷺ ने अपनी ज़िदगी में कर के दिखाया। सूफ़ी होना दरअस्ल हुज़ूरﷺ के बताए जैसा बनने की कोशिश करना ही है। जब अल्लाह को सबसे ज्यादा महबूब हुज़ूरﷺ ही हैं और सबसे पहले हुज़ूरﷺ ही का नूर पैदा किया गया तो ये बात भी बिल्कुल साफ़ है कि सबसे पहले सूफ़ी हज़रत मुहम्मदﷺ ही हैं।
मौलाना अब्दुर्रहमान जामी रहमतुल्लाह ने ''सबसे पहले सूफ़ी के रूप में अबू हाशिम कोफ़ी को बताया। ''यानी पहली हिजरी में भी 'सूफ़ी' शब्द था। उसी को शेखुल इस्लाम ताहिरुल क़ादरी ने किताबे सुन्नत की रौशनी में यूँ बयान किया है कि ''सूफियाए इस्लाम'' ने जो सूफ़ीवाद अपनाया वो आख़री पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पवित्र जीवन का नैतिक पहलू है। इसको सभी सिलसिलों के सूफियों ने और सिलसिलए चिश्तिया के बुजुर्गों ने खास तौर से अपने सूफ़ीवाद के सिद्धांत की बुनियाद करार दिया है।''
हिन्दुस्तान की यात्रा करने वाले पहले सूफ़ी बुजुर्ग दाता गंज बख्श अली हजवेरी लाहौरी रहमतुल्लाह अलैहि है | दाता गंज बख्श को पहला सूफी लेखक भी माना जाता है जिन्होंने सूफीवाद पर कई किताबें लिखीं। उनकी सबसे मशहूर किताब कशफ उल महजूब है |
दाता गंज बख्श अली हजवेरी लाहौरी रहमतुल्लाह अलैहि ने अरबी के 'सुफ्फा' और हिंदुस्तानी शब्द ''सफाई'' से जोड़ उसका बयान यूँ किया है। सूफ़ी वो है जो अपने नश्वर अस्तित्व को परम सत्य की खोज में डूबा दे और दुनियावी ख्वाहिशों से मुक्त होकर आध्यात्मिकता और सत्यता से अपना रिश्ता जोड़ ले। सादगी, उच्च नैतिकता, न्यायप्रियता और दूसरों की इज़्ज़त करना सूफ़ी चरित्र की बुनियाद है। दुनियावी व शारीरिक इच्छाओं से बचना, आत्मा और अपनी ज़रूरतों पर क़ाबू रखना सूफ़ी की आदत में होता है। और सूफ़ी अपने को तपा कर मैं और तुम की बंदिशों से पाक हो जाता है।''
दाता गंज बख्श अली हजवेरी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं, 'हया के फूल, सब्र व शुक्र के फल, अज़ व नियाज़ की जड़, ग़म की कोंपल, सच्चाई के दरख्त के पत्ते, अदब की छाल, हुस्ने एख़लाक़ के बीज, ये सब लेकर रियाज़त के हावन दस्ते में कूटते रहो और इसमें इश्क़े पशमानी का अर्क़ रोज़ मिलाते रहो। इन सब दवाओं को दिल की डेकची में भरकर शौक के चूल्हे पर पकाओ। जब पक कर तैयार हो जाए तो सफ़ाए क़ल्ब की साफी में छान लेना और मीठी ज़बान की शक्कर मिलाकर मोहब्बत की तेज़ आंच देना, जिस वक्त तैयार हो कर उतरे तो उसे ख़ौफे ख़ुदा के हवाले से ठंडा कर इस्तेमाल करना।'' ये ही वो महान नुस्खा है जो इंसान को इश्के ख़ुदा की भट्टी में तपा कर आज भी कुंदन कर सकता है। सूफियों की इबादत, नेक अमल और उच्च नैतिक मूल्यों का व्यावहारिक जीवन होता है। ये लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं और सहाबा के नक्शे कदम पर अमल करते हुए, कुरानी की शिक्षाओं को अपना कर इबादत को अपने जीवन का उद्देश्य बना लेते हैं। सूफियों का हर अमल सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा की खातिर होता है। दुनिया के ज़ायके और हवस की खातिर नहीं।
ख्वाजा गरीब नवाज़ मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं, अल्लाह का वली बनने के लिए पहला क़ौल ये है कि मज़लूमों की फरियाद सुनना, बेचारों की आवश्यकता को पूरी करना और भूखों को खाना खिलाना'' ख्वाजा ग़रीब नवाज़ मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैहि ने फ़रमाया कि अल्लाह के वली में तीन विशेषता होनी चाहिए:-
1- दरिया के जैसी सखावत (उदारता),
2- आफ़ताब की सी मोहब्बत,
3- ज़मीन के जैसी खाकसारी''।
आगे फ़रमाते हैं कि सूफ़ी का बहुलता में वहदतुल वजूद का जलवा दिखाई देता है। आपने मारफत के मक़ाम और आरिफ के कमालात यूँ लिखे हैं। ''आरिफ'' ज्ञान के सभी क्षेत्रों से परिचित होता है, इसरारे इलाही के हक़ाएक़ और नूरे इलाही की अनुभूति करता है। आरिफ 'इश्के इलाही में खो जाता है और उठते- बैठते, सोते- जागते उसकी प्रकृति में खोया और उससे परिचित रहता है।
ख्वाजा गरीब नवाज़ मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं, अल्लाह का वली बनने के लिए पहला क़ौल ये है कि मज़लूमों की फरियाद सुनना, बेचारों की आवश्यकता को पूरी करना और भूखों को खाना खिलाना'' ख्वाजा ग़रीब नवाज़ मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैहि ने फ़रमाया कि अल्लाह के वली में तीन विशेषता होनी चाहिए:-
1- दरिया के जैसी सखावत (उदारता),
2- आफ़ताब की सी मोहब्बत,
3- ज़मीन के जैसी खाकसारी''।
आगे फ़रमाते हैं कि सूफ़ी का बहुलता में वहदतुल वजूद का जलवा दिखाई देता है। आपने मारफत के मक़ाम और आरिफ के कमालात यूँ लिखे हैं। ''आरिफ'' ज्ञान के सभी क्षेत्रों से परिचित होता है, इसरारे इलाही के हक़ाएक़ और नूरे इलाही की अनुभूति करता है। आरिफ 'इश्के इलाही में खो जाता है और उठते- बैठते, सोते- जागते उसकी प्रकृति में खोया और उससे परिचित रहता है।
इस्लाम में सूफ़ीवाद दुनिया को छोड़ने का नाम नहीं। इस बारे में महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैहि ने फ़रमाया, दुनिया तर्क (छोड़ने) का ये अर्थ नहीं कि, कोई अपने आपको तंग करे और लंगोट बाँध कर बैठ जाए, बल्कि तर्के दुनिया ये है कि लिबास भी पहने, खाना भी खाए और हलाल की जो चीज़े उन्हें पहुँचे उसे इस्तेमाल करे लेकिन उन्हें इकट्ठा करने की ओर प्रेरित न हो और दिल को उससे न लगाए। (फ़ौदुल फ़वाइद अज़- निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैहि), तर्के दुनिया है।''
हर फक़ीर सूफ़ी नहीं हो सकता है। हज़रत जलालुद्दीन बुखारी रहमतुल्लाह अलैहि के नज़दीक फ़क़ीर के लिए ये चीजें अनिवार्य हैं। ''पश्चाताप, ज्ञान, हलम, मारफत (अनुभूति), बुद्धि, फियत (भलाई), दया, प्रेम, गरीबी, नैतिकता, बेचारगी, ख़ौफ़, विश्वास, ग़रीबी, शौक, तजदीक, आनंद, रियाज़त, सौभाग्य, हसर, मस्ती, हिम्मत, मोहब्बत, वस्ल, क़र्ब, अदब, इश्तियाक़ (तीव्र इच्छा), तस्लीम और दीदार (दर्शन)।''
दिल्ली में एक बड़े सूफ़ी बुज़ुर्ग हुए अमीर ख़ुसरो रहमतुल्लाह अलैहि जिनका कलाम सुफ़ियों का तज़किरह और सूफ़ी सोच व अंदाज़ का एक बड़ा ख़ज़ाना है। वो एक साथ सूफ़ी थे और सिपाही भी। वो शायर के साथ इतिहासकार भी थे। आज भारत व पाक में जब भी जहां भी किसी सूफ़ी का उर्स हो उसमें ''रस्मे कुल' के साथ 'रंग' और 'सुफ़ियाना कलाम की क़व्वाली' बिना 'कलामे ख़ुसरो'' के कभी भी पूरी नहीं होती।
प्रोफेसर उन्वान चिश्ती के अनुसार, सूफ़ीवाद व्यक्ति के व्यावहारिक, नैतिक और रूहानी व्यक्तित्व का गठन करता है, तो दूसरी तरफ एक नेक और निःस्वार्थ समाज के निर्माण पर ज़ोर देता है। ये उच्च नैतिकता और चारित्रिक महानता हमें हर एक सूफ़ी में मिलती है। इसी शीर्षक में डॉ. तनवीर चिश्ती के अनुसार, ''सूफ़ीवाद का उद्देश्य मनुष्य में नैतिकता जैसे गुण, खुदा का ख़ौफ़, और प्रेम जैसी स्थिति, दुनिया से बेनियाज़ी, बेरग़बती (अनाकर्षण), खामोशी, अकेले रहना जैसे भौतिक रुझान, फिक्र, रातों को जागना, खुदा का ज़िक्र, इबादत जैसे कामों को बढ़ावा देना ताकी आत्मा में आवश्यक गुण (दादे सुफ़्फा) जाग सके।'' सूफ़ी को एक साथ विलायत और वेलादत दोनों एजाज़ात हासिल होते है।
फ़ौदुल फ़वाइद अज़- (निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैहि)। जो रिश्ता सूफ़ी का ख़ुदा से होता है वो 'विलायत'' है। जो मामले खुदा के बन्दों के साथ है वो 'वेलादत' का रिश्ता है।''
फ़ौदुल फ़वाइद अज़- (निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैहि)। जो रिश्ता सूफ़ी का ख़ुदा से होता है वो 'विलायत'' है। जो मामले खुदा के बन्दों के साथ है वो 'वेलादत' का रिश्ता है।''
इस्लाम में सूफ़ीवाद का रूप यूँ समझ में आ जाता है। हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि ''हज़रत हारिसा रज़ियल्लाहू अन्हू से सरकार सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ... ऐ हारिसा तेरे ईमान की क्या हक़ीक़त है? हज़रत हारिसा रज़ियल्लाहू अन्हू ने जवाब दिया या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम, मेरे ईमान की ये हक़ीक़त है कि मैंने ख़ुदा को दुनिया से अलग कर लिया यानि मैंने दुनिया को दिल से निकाल दिया, और रातों को जागता हूँ यानी यादे इलाही में लगा रहता हूँ। और अब ये आलम हो गया कि मैं अर्शे आज़म को बेनक़ाब देखता हूँ। ये सुनकर पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया हारिसा तू आरिफ हो गया है, तू राज़ को जान गया है। इस हाल को थामे रहना और इस पर दृढ़ता से लगे रहना।
हज़रत शेख शहाबुद्दीन सोहरावर्दी ने यूँ फ़रमाया कि सूफ़ीवाद के इल्म (ज्ञान) का औसत पालन, इश्क की इंतेहा और अताए इलाही है। इस परिभाषा के अनुसार सूफ़ीवाद के तीन पहलू हुए:- इल्मी (ज्ञान), अमली (व्यावहारिक) और इश्क़े हक़ीक़ी (वास्तविक प्रेम)। और गूढ़ रूप से यहाँ ये समझे कि ''आलिम का सूफ़ी होना ज़रूरी नहीं बल्कि सूफ़ी का आलिम होना ज़रूरी है।
'इसके बारे में कुरान की ये हिदायत कि ''ख़ुदा से डरो जैसा डरना चाहिए। ताकि इंसान गुनाहों से पाक रहे।'' मगर किताबे इलाही ही फ़रमाती है,''औलिया अल्लाह को ना कोई ख़ौफ न ख्रतरा, उनकी हिफ़ाज़त ख़ुद ख़ुदा करता है।' ये बात है सूफ़ी संतों के नेक अमल की।
सूफी किसे कहते हैं ?
- सूफी वो हैं जो अल्लाह को पाने के लिए धर्म की वास्तविकता यानि मुहब्बत पर ध्यान केन्द्रित किया उस सीधे रास्ते को अपनाया जो सीधे अल्लाह से जा मिलता है।
- अपनी बातें अपने किरदार (व्यक्तित्व), अख्लाक व अमल और मोहब्बत से समझाई।
- दुनिया की चाहत को अपने पास भी भटकने नहीं दिया, बल्कि दुनियादारी से बचना जरूरी समझा।
- शरीअत के हुक्म की पैरवी के साथ साथ उसकी हिफाजत भी कुबूल की।
- जाहिरी व बातिनी से बुराई, बेइमानी व धोखे को निकाल फेंका और अंदर व बाहर से एक जैसा होना उनकी निशानी बन गई है।
- अपनी इबादत (पूजा) को जन्नत (स्वर्ग) के लालच और दोजख (नर्क) के खौफ (डर) से आजाद किया।
- इन्सानों की भलाई व खिदमत की, ये नहीं देखा कि सामने इन्सान का रंग क्या है, नस्ल क्या है, कौम-मजहब क्या है, मुल्क व वतन क्या है?
- हिन्दू हो या मुस्लिम हो या सिख हो या ईसाई, इनकी बारगाह से कोई मायूस व नामुराद नहीं लौटाया।
- जूद व सखा (दान पुण्य) उनकी आदत होती है।
अल्लाह अज़वजल हम सभी को सिलसिलए चिश्तिया के
बुजुर्गों के नक्शे कदम पर चलने की तौफ़ीक़ दे | हम सभी को सीधी राह पर साबित क़दम रख कर एक नेक इंसान और नेक इल्म (दीन) को हासिल करने की तौफ़ीक़ दे ।
“ऐ अल्लाह !!!
हमें भी हक़ पर चलने वाले उन चन्द कामयाब लोगों में शामिल कर,
जिन पर तेरा करम व फ़ज़ल और ईन्आम हुवा है।”
हमें भी हक़ पर चलने वाले उन चन्द कामयाब लोगों में शामिल कर,
जिन पर तेरा करम व फ़ज़ल और ईन्आम हुवा है।”
आमीन । या रब्बल्आलमीन।



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