सूफीयों की जिंदगी हिदायत का सरचश्म होती है। इन गोदड़ी ओड़ने वाले मुख्लिस बंदों को पहचानना हर किसी के बस की बात नहीं। एक मशहूर क़ौल है कि ”वली को वली ही पहचानता है।”
हज़रत जुन्नून मिस्री (र.अ.) फरमाते हैं-
”सूफ़ी वो कि जब बोले तो उसके ज़बान से हक़ (सच्ची बात, अल्लाह का जिक्र) ज़ारी हो और जब खामोश हो तो उसके जिस्म का एक एक रोंगटा ये शहादत दे कि उसके अन्दर दुनिया की कोई हवस मौजूद नहीं।”
हज़रत हुसैन बिन मन्सूर (र.अ.) फरमाते हैं-
”सूफ़ी की ज़ात यकता (अकेली) होती है- न अल्लाह के सिवा उसे कोई कुबूल करता है और न ही वो अल्लाह के सिवा किसी को कुबूल करता है।”
हज़रत अबू-हमजा बगदादी (र.अ.) फरमाते हैं-
”सच्चे सूफ़ी की ये पहचान है मालदार होने के बावजूद वो फकीर रहे और इज्जतदार होने के बावजूद हक़ीर रहे (खुद को छोटा समझे)।”
हज़रत जुनैद बगदादी (र.अ.) फरमाते हैं-
”सूफ़ी की मिसाल ज़मीन जैसी है कि हर मरी चीज़ इसमें फेंकी जाती है लेकिन इसमें से बहुत खुबसूरत चीज़ निकलती है।”
हज़रत शरफुद्दीन यहया मुनीरी (र.अ.) फरमाते हैं-
”सूफ़ी वो है जो अल्लाह के 99 सिफात से हक़ीक़तन मौसूफ़ हो।”
हज़रत अबू-तुराब नख़शबी (र.अ.) फरमाते हैं-
”सूफ़ी के दिल को कोई चीज मैला नहीं कर सकती मगर उससे हर चीज को सफाई हासिल होती है।”
हज़रत नूरी (र.अ.) फरमाते हैं-
”सूफ़ी की तारीफ ये है कि उसे मोहजाती (गरीबी) के वक्त सुकून हो और अगर कुछ पास आए तो किसी को दे दे।”
हज़रत अबुबक्र सिद्दीक़ (रजि.अ.) इस्लाम के पहले खलिफा है। आप मक्का के सबसे मालदार (धनवान) लोगों में से थे। एक मौके पर आपने अपना सारा माल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के कदमों पर रख दिया। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा क्या कुछ अपने परिवारवालों के लिए भी छोड़ा? तो आपने फरमाया – ”(उनके लिए) अल्लाह और उसका रसूल है।”
ये जुमला (वक्तव्य) एक सूफ़ी की ज़बान से ही निकल सकता है।
इसी पर डॉक्टर अल्लामा ईक़बाल ने कहा है-परवाने को चिराग तो बुलबुल को फूल बस।सिद्दीक के लिए खुदा और रसूल बस।।


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