एक सूफ़ी कहानी है फरीदुद्दीन अत्तार की लिखी हुई. जब मैने इसे पढ़ा तो लगा कि यह हमें जीवन में अनित्यता का बोध करा सकती है.
अत्तार ने एक दरवेश के बारे में लिखा जो रोज़ रात को बिलानागा बंदगी करता था. जो कुछ उसने अपने मुर्शिदों से सीखा उसका अभ्यास करता था. एक बार उसने हज करने का सोचा. वह हज के लिए महीनों लंबी मुश्किल यात्रा पर निकला और चलते-चलते एक गाँव पहुँचा. वह भूख और थकान से बेदम था. गाँव अनजाना था. उसने एक राहगीर से पूछा, “मुझ दरवेश को ठहरने के लिए कहाँ जगह मिल सकती है?”. उसने जवाब दिया, “यहाँ शाक़िर नाम का शख्स रहता है, आप उसके घर चले जाइए. वह इस इलाके का सबसे अमीर आदमी है और बहुत रहमदिल और बड़े दिल वाला है. वैसे तो इस इलाके का सबसे बड़ा सेठ हमदाद है लेकिन बेहतर यही होगा कि आप शाक़िर के घर जाएँ”.
दरवेश शाक़िर के घर गया. शाक़िर का अर्थ होता है – जो शुक्राना करता रहता है. जब उसके पास पहुँचा तो जैसा उसके बारे में सुना था शाकिर बिल्कुल वैसा ही निकला. शाक़िर ने उसे अपने घर में बड़ी इज्ज़त देकर पनाह दी. भोजन दिया, बिस्तर दिया. शाक़िर की बीवी और बच्चों ने उसकी बहुत ख़ातिर की. दरवेश दो दिन वहां ठहरा. तीसरे दिन जब वह चलने लगा तो उन्होंने उसको रास्ते के लिए खाना, पानी, खजूरें आदि दिया. चलते समय दरवेश ने कहा, “शाक़िर, तू कितना अच्छा है| तू कितना अमीर है, तूने मुझे इतना कुछ दिया पर इस बारे में ज़रा भी सोचा, जबकि तू मुझे जानता भी नहीं है.”
शाक़िर ने अपने मकान की ओर नज़र दौड़ाई और कहा, “गुज़र जाएगा”. दरवेश शाकिर की बात पर पूरे रास्ते सोचता रहा क्योंकि उसके मुर्शदों ने कहा था कि जल्दबाज़ी में कोई फैसला मत लिया करो और जब किसी से बात सुनो तो उसकी गहराई में जाओ. वह अपने दिल की धड़कनों को सुनते हुए सोच-विचार करता रहा कि शाक़िर ने अपनी अमीरी और दौलत की ओर इशारा करते हुए ये क्यों कहा कि ‘गुज़र जाएगा’. वह आने वाली किसी घटना के बारे में कह रहा था या फिर ऐसे ही बोल गया? खैर, दरवेश मक्का पहुँचा. हज करने के बाद वह साल भर तक वहीं रुका रहा. साल भर बाद वहन से लौटते समय उसने शाकिर से मिलने का तय किया. जब वह वहाँ पहुँचा तो उसने देखा कि शाक़िर का मकान ही नहीं है! लोगों ने बताया कि अब वह हमदाद के घर में नौकर है. उन्होंने बताया कि शाकिर का मकान बाढ़ में बह गया. उसके मवेशी भी बह गए और वह बहुत गरीब हो गया इसलिए उसने हमदाद के घर में नौकरी कर ली.
दरवेश बहुत हैरान हुआ कि इतने नेक बन्दे को इतनी आफतें झेलनी पडीं! फिर वह हमदाद के घर गया और वहां शाक़िर फटे-पुराने कपड़े पहने मिला. उसकी बीवी और बेटियाँ भी उसके साथ में थीं और उनकी हालात भी ऐसी ही थी. दरवेश ने शाकिर से कहा, “मुझे यह देखकर बड़ा दुख हुआ कि तेरे जैसे नेक आदमी के साथ इतना बुरा हुआ.” शाक़िर ने गम्भीर स्वर में कहा, “यह भी गुज़र जाएगा”.
हमदाद भी नेक आदमी था, उसने भी दरवेश को पनाह दी. कुछ समय वह यहीं रहा. जब दरवेश जाने लगा तो शाक़िर ने उतना तो नहीं पर फिर भी कुछ रूखा-सूखा खाने को साथ में दिया. दो-चार साल गुज़र गए पर दरवेश हमेशा शाक़िर को याद करता. उसका मन फिर से मक्का की यात्रा करने की ख्वाहिश करने लगा. वह उसी रास्ते से गुज़रा और हमदाद के घर गया. उसे पता चला कि इस बीच हमदाद की मौत हो गई है और उसने अपना सब कुछ शाक़िर को दे दिया क्योंकि उसकी अपनी कोई औलाद नहीं थी.
शाक़िर फिर से अमीर हो गया. उसके बदन पर फिर रेशमी वस्त्र आ गए. उसकी बीवी गहने पहनने लगी और बेटियों की शादी अमीर घरानों में हो गयी. दरवेश शाकिर से मिलने पर बार-बार कहता रहा, “वाह शाक़िर! इतना अच्छा! खुदा ने खूब रहमत की तेरे ऊपर!”. और शाक़िर कहता, “यह भी गुज़र जाएगा”.
कुछ दिन दरवेश उसके घर ठहरा, फिर मक्का गया. इस बार वह वहां दो साल रहा. वापसी में जब वह शाकिर के गाँव पहुंचा तो उसे पता चला कि शाक़िर मर चुका है. फकीर ने लोगों से पूछा, “उसकी कब्र कहाँ है? मैं उसकी कब्र पर जाकर नमाज़ पढ़ूंगा और उसके लिए दुआ करूँगा.” लोगों ने शाक़िर की कब्र का पता दिया. जब वह कब्र के पास देखा उसपर एक तख़्ती लगी हुई थी जिस पर लिखा था, “यह भी गुज़र जाएगा”. पढ़कर दरवेश बहुत रोया, कहता, “यह भी गुज़र जाएगा, अब इसमें भी और कौन सी गहराई की बात छुपी है!?”
दरवेश फिर अपने डेरे को निकला. कई साल गुज़र गए. एक रोज़ जब एक काफ़िला मक्का की ओर जा रहा था तो उसे लगा कि जिंदगी का आखिरी हज भी कर लिया जाए. वह चल तो सकता नहीं था लिहाज़ा ऊँट पर सवार होकर निकल पड़ा. रास्ते में शाक़िर का गाँव आना था. उससे रहा न गया और वह शाक़िर की कब्र पर फूल चढ़ाने और दुआ करने के लिए कब्रिस्तान की ओर चल दिया. जब वह वहाँ पहुँचा उसने पाया कि शाक़िर की कब्र का तो नामोनिशान ही नहीं था. लोगों से पूछा तो पता चला कि एक जलजला आया था जिसमें सब तहस-नहस हो गया. वह कब्र कहाँ गई, कुछ पता नहीं. इस बीच इतने साल गुज़र गए और सब बदल गया. जहाँ उसकी कब्र थी, अब वहाँ आबादी हो गई थी.
दरवेश को शाक़िर का यह वचन पूरी तरह समझ आ गया कि “यह भी गुज़र जाएगा”. उसकी तो कब्र भी गुज़र गई.
यह एक जुमला यदि आदमी के दिल में बसा रहे तो , सुख और दुःख से सदा उसे निर्लिप्त रख सकता है…
न दुःख स्थायी है न सुख …अगर ऐसा न हो तो इस जीवन के रंग ही ख़त्म हो जाएँ !इसे जो समझ गए वही असल में सुखी हैं !
वक़्त अच्छा हो या बुरा गुजर ही जाता है …
बुरे वक़्त में हिम्मत देता है तो अच्छे वक़्त में समझदारी ..
ज्ञानवर्धक ..


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