मुरीद कौन है?





मुरीद कौन है? 


हजरत मुहम्‍मद सल्‍ल. को जो देखकर ईमान लाया उसे ”सहाबी” कहते हैं। सहाबी के मायने होते हैं”सरफे सहाबियत” यानि सोहबत हासिल करना। हुजूर की सोहबत जो उठाए वो सहाबी।

आलातरीन निसबत के एतबार से सहाबी अपने आप में अकेला है जिसने हजरत मुहम्‍मद सल्‍ल. की सोहबत उठाई। तसव्‍वुफ में सूफीया ने इसी इरादत को ”मुरीदी” नाम दिया है। मुरीदी का मफहूम (सार) भी यही है कि जिस मुर्शिद कामिल से लगाव हो जाए और दिल उसकी तरफ माएल हो जाए तो उसकी खिदमत में सच्‍चे दिल से नियाजमंदी के साथ फरमाबरदार हो जाए।


इसी से आखिरत भी संवर जाएगी और ये हुक्‍मे खुदा भी है–


يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَكُونُوا۟ مَعَ ٱلصَّـٰدِقِينَ [٩:١١٩]


ऐ ईमानवालों ख़ुदा से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ।


(कुरआन-9.सूरे तौबा-119)


इस आयात में तीन बातें कही गयी हैं एक ईमान–बिल्‍लाह, दुसरा तकवा-अल्‍लाह और तीसरा सोहबत-औलियाअल्‍लाह।


तकवा की जामे तारीफ में सूफीयों ने कहा कि- ”खुदा तुझे उस जगह न देखे जहां जाने से तूझे रोका है और उस जगह से कभी गैर हाजिर न पाए जहां जाने का हुक्‍म दिया है।”


यहां सबसे ज्‍यादा गौर करने वाली बात ये है कि अल्‍लाह ईमानवालों से बात कर रहा है। ये नहीं फरमा रहा कि सच्‍चों के साथ जो जाओ और ईमान लाओ, बल्कि ये फरमा रहा है कि ईमानवालों के लिए भी अल्‍लाह से डरना और सूफीयों की सोहबत जरूरी है।


कुरआन में अल्‍लाह फरमाता है-


يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱبْتَغُوٓا۟ إِلَيْهِ ٱلْوَسِيلَةَ وَجَـٰهِدُوا۟ فِى سَبِيلِهِۦ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ [٥:٣٥]


”ऐ ईमानवालों! तुम अल्‍लाह से डरते रहो और उस तक पहुंचने का वसीला तलाश करो और उसकी राह में जिहाद करो ताकि तुम कामयाब हो जाओ”

(कुरआन-5.सूरे माएदा-35)


इस आयत में पूरा तसव्‍वूफ ही सिमट आया है, यहां फलहो कामयाबी (मोक्ष) के लिए चार बातें कही गयीं हैं–


1) ईमान –


जुबान से इकरार करना और दिल से तस्‍दीक़ करना कि अल्‍लाह एक है और हजरत मुहम्‍मद सल्‍ल. अल्‍लाह के रसूल हैं।


2) तक़वा –


अल्‍लाह ने जिस काम का हुक्‍म दिया उसे करना और जिस से मना किया है उस से परहेज़ करना।


3) वसीला –


अल्‍लाह के नेक बंदों से सोहबत (संपर्क) अख्तियार करना।


4) जिहाद –


अपने नफ्स (इन्द्रियों) और अना (मैं) को अल्‍लाह की राह में मिटा देना।



”ज़ाहिरी तौर पर बिना मां-बाप के बच्‍चा नहीं हो सकता, ठीक उसी तरह बातिनी (अध्‍यात्‍म) में बिना पीर (गुरू) के अल्‍लाह की राह मुश्किल है।”


”हर मुरीद ये यकीन रखे कि बेशक तुम्‍हारा पीरे कामिल ही वो है जो अल्‍लाह से मिलाता है। तुम्‍हारा तअल्‍लुक अपने ही पीर के साथ पक्‍का हो, किसी दुसरे की तरफ माएल न हो।”


”अपने पीर से मदद मांगना, हजरत मुहम्‍मद सल्‍ल. से मदद मांगना है, क्‍योंकि ये उनके नाएब और जानशीन (उत्‍तराधिकारी) हैं। इस अक़ीदे को पूरे यक़ीन से अपने पल्‍लु बांध लो।”


मुरीद होना (बैअ़त होना)



चूं तू करदी ज़ात मुर्शिद रा क़ुबूल
हम ख़ुदा आमद ज़ ज़ातिश हम रसूल
नफ़्स नतवां कश्त इल्ला ज़ाते पीर
दामने आं नफ़्स कुश महकम बगीर

(मौलाना जलालुद्दीन रूमीؓ)

जब तूने पीर की ज़ात को कुबूल कर लिया तो तुझ से अल्लाह भी मिल गया और रसूलﷺ  भी।

उस नाफ़रमान नफ़्स को पीर की ज़ात के सिवाए कोई नहीं मार सकता, तो उस नफ़्स के मारनेवाले (पीर) का दामन मज़बूती से पकड़ ले।


तरीक़त की तलाश और बातिनी कमालों का हासिल करना, हम पर वाजिब है। लेकिन ये रास्ता निहायत ही नाज़ुक और दुश्वार है, क्योंकि नफ़्स और शैतान, इससे रोकने में लगे हुए हैं।

बेशक नफ़्स, इन्सान को बुराई की तरफ़ ले जाने वाला है, मगर (ये उसके लिए नहीं है) जिस पर खुदा रहम करे।
(कुरान 12:53)

बेशक़ शैतान, इन्सान का खुला दुश्मन है।
(कुरान 17:53)

नफ़्स और शैतान से बचने का तरीक़ा, मुर्शिद कामिल से बैअ़त है। बैअ़त होना, रब तक पहुंचने का सबसे आसान व सबसे ज़्यादा नज़दीक का रास्ता है, क्योंकि इसमें नफ़्सानियत नहीं है और न ही शैतानियत है।
हज़रत इश्तियाक़ आलम शाहबाज़ीؓ फ़रमाते हैं. कुरान को कुरान हम इसलिए मानते हैं कि उसकी सनद मौजूद है। अहादीस नबवीया को कलामे रसुलल्लाह इसलिए मानते हैं कि उसकी भरोसेमंद सनद मौजूद है। इसी तरह इसकी भी सनद मौजूद है कि रूहानी मुर्शिदे कामिल का दिल, अपने पीर के दिल से होता हुआ, रसूले अकरमﷺ  से मिला हुआ होता है।

यही मुर्शिदे कामिल का गिरोह ही है जो बनामे सूफ़ीया व तालिमाते तसव्वफु़, बारगाहे नबुव्वतﷺ  के सच्चे वारिस व अमीन हैं। इनका सिलसिलए रूहानी, ज़ंजीर की मुसलसल मज़बूत कड़ीयों जैसा है। जिसका सरचश्मा तक़दीस व रूहानियत, क़ल्बे रसूल है। इस ज़ंज़ीर से जुड़ने के लिए और क़ल्बे रसूलल्लाह तक पहुंचने के लिए बैअ़त ज़रूरी है। और हुज़ूरﷺ  तक पहुंचना यानी खुदा तक पहुंचना है। क्योंकि…
(ऐ महबूब) बेशक जो लोग आपसे बैअ़त करते हैं, वो अल्लाह ही से बैअ़त करते हैं। उनके हाथों पर (आपके हाथों की सूरत में) अल्लाह का हाथ है।
(कुरान 48:10)

बैअ़त, सूफ़ीया किराम के यहां ये सब से अहम तरीन रूक्न है, जिसके ज़रिये तालीम व तरबियत, रुशदो हिदायत और इस्लाह अहवाल का काम शुरू होता है। बैअ़त.ए.शैख अल्लाह के हुक्म से और हुज़ूरे अकरम हज़रत मुहम्मदﷺ  के अमल से साबित है। बैअ़त का अमल हुज़ूरﷺ  के अमल ‘बैअ़त.उर.रिजवान’ से बतरिकए ऊला साबित है। कुछ अहले इल्म के नज़दीक बैअ़त वाजिब है और कुछ ने बैअ़त को सुन्नत कहा है। बल्कि ज़्यादातर ने इसे सुन्नत ही कहा है।

बैअ़त की कई किस्में होती है, लेकिन तज़किया.ए.नफ़्स और तसफि़या.ए.बातिन के लिए जो सूफ़ीया किराम बैअ़त करते हैं, वो कुरबे इलाही का ज़रिया बनता हैं और इसी को ‘बैअ़त.ए.शैख’ कहते हैं।

जब कोई बैअ़त व इरादत का चाहने वाला हाजि़र होता है और इज़हारे गुलामी व बन्दगी के लिए हल्कए मुरीदैन में शामिल होना चाहता है तो उसका हाथ अपने हाथ में लेकर हल्कए इरादत और तरीकए गुलामी में दाखिल किया जाता है।

फिर तालीब से पूछते हैं कि वो किस खानवाद ए मारफ़त (क़ादिरिया, चिश्तिया, नक्शबंदिया वगैरह) में बैअ़त कर रहा है और उससे सुनते है, वो किस खानवाद ए तरीक़त में दाखिल हुआ। शिजरा ए मारफ़त के सरखेल का नाम लेते हुए सिलसिला ब सिलसिला अपने पीर के ज़रिए अपने तक पहुंचाते हैं और कहते हैं कि क्या तू इस फ़क़ीर को कुबूल किया? तालिब कहता है कि दिलो जान से मैंने कुबूल किया, इस इक़रार के बाद उसे कहते हैं कि हलाल को हलाल जानना और हराम को हराम समझना और शरीअ़ते मुहम्मदीﷺ  पर क़दम जमाए रखना।

अकाबिरों के नज़दीक वसीला से तवस्सले मुर्शिद ही मुराद है। हज़रत मौलाना शाह अब्दुर्रहीमؓ, शाह वलीउल्लाह मुहद्दीसؓ और शाह अब्दुल अजीज मुहद्दीस देहलवीؓ जैसे साहेबान का भी यही मानना है। इसमें कोई शक नहीं है कि अल्लाह की बारगाह में मुकर्रेबीन का वसीला ही वो वसीला है जिसे हासिल करने की हिदायत, अल्लाह ने कुरान में फ़रमाई।

दोबारा बैअत होना कैसा है?


बिला वजह बैअत तब्दील करना शरई तौर पर मना है। लेकिन फ़ैज़ उठाना जायज़ है, बल्कि मुबाह है। एक बार तीन कलंदर हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाؓ की खि़दमत में हाजि़र हुए और खाना मांगा। जब खाना पेश किया गया तो उन्होंने फेंक दिया। कहा. खाना अच्छा नहीं है, दूसरा लाओ। फिर लाया गया तो फिर फेंक दिया। जब तीसरी बार भी ऐसा किया, तो महबूबे ईलाही हज़रत निज़ामुद्दीनؓ ने उन्हें पास बुलाकर कान में कहा. ये खाना तो उस मुरदार से बेहतर था, जो तुमने रास्ते में खाया था। हज़रत के इस ग़ैब के इल्म को देखकर कलंदर कदमों पर गिर पड़े। हज़रत ने उन्हें उठाया और अपने सीने से लगाकर रुहानी गि़ज़ा अता की। उसके बाद कलंदर वज्द में रक़्स करने लगे और ये कहने लगे कि मेरे हुज़ूर ने मुझे नेअमत अता फ़रमाई। वहां हाजि़र लोगों ने कहा. कैसे बेवकफू लोग हो, तुम्हें तुम्हारे पीर ने नहीं बल्कि हमारे पीर ने नेअमत अता की है। इस कलंदर ने कहा. बेवकफू तुम हो, अगर मेरे पीर की नज़रे इनायत नहीं होती तो तुम्हारे पीर से मुझे कुछ नहीं मिलता। ये मेरे पीर का ही सदक़ा है कि तुम्हारे पीर से मुझे फ़ैज़ हासिल हुआ। ये सुनकर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया महबूबे ईलाहीؓ फ़रमाते हैं. ये बिल्कुल सच कह रहा है। मुरीदी सीखना है तो इससे सीखो।

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