रू-इ-ज़मीन पर इंसानियत की रहनुमाई के लिए नबियो और रसूलो का सिलसिला
*हज़रात इस दुनिया में आदम अलयाही सलाम के बाद उनकी औलादे हुई और औलादो की औलादे होने लगी,और ज़मीन पर इंसानों की तादाद बढ़ने लगी,धीरे धीरे ये ज़मीन पर फैलने लगे और समाज, कुनबा और क़बिले और कौमो में बट गए.
*जैसा की अल्लाह ता’अला ने वादा किया था की इंसानियत की रहनुमाई के लिए अपने नबियो और रसूल्लो को भेजुगा. तो अल्लाह ता’अला ने हर कौम के लिए नबी और रसूल भेजे,ताकि इंसान अपने अपने रब को पहेचाने और शरियत या कानून के हिसाब से अपनी ज़िन्दगी गुज़ारे,जिस से उसकी दुनिया और आखिरत दोनों संवर जाए.और वोह हराम, हलाल, नेकी और गुनाह को समझ सके.
*एक रिवायत में है की अल्लाह ता’अला ने इंसानों की रहनुमाई के लिए 124000 पैगम्बर भेजे. इस से मुराद से कम भी हो सकते है और जियादा भी. ये पैगम्बर दुनिया के हर हिस्से में जहा भी इंसानी कौम थी भेजे गए.
*इनमे जो पैगम्बर हुवे और जिनका जिक्र कुरान शरीफ में अल्लाह ता’अला ने किया है,वो इस तरह है.
- आदम अलैहे सलाम
- शीश अलैहे सलाम
- नूह अलैहे सलाम
- शोएब अलैहे सलाम
- सालेह अलैहे सलाम
- इदरीस अलैहे सलाम
- हुद अलैहे सलाम
- ज़कारिया अलैहे सलाम
- इब्राहीम अलैहे सलाम
- दावूद अलैहे सलाम
- सुलेमान अलैहे सलाम
- जुलकरनैन अलैहे सलाम
- अय्यूब अलैहे सलाम
- याकूब अलैहे सलाम
- दायियल अलैहे सलाम
- मूसा अलैहे सलाम
- हारुन अलैहे सलाम
- इस्माइल अलैहे सलाम
- इशाक अलैहे सलाम
- युनुस अलैहे सलाम
- युसूफ अलैहे सलाम
- याहया अलैहे सलाम
- इसा अलैहे सलाम,और आखिर में हमारे प्यारे आका
- हुजुर सरकारे दो जहा मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम
571ई. असहाबे फ़ील के वाकिये के 55 दिन बाद, मौसमे बहार में 12 रबीउल अव्वल मुताबिक 20 अप्रैल को बरोज़ पीर, सुबह फजर के वक्त मक्का में आपकी विलादत हुई। आपके दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने आपका नाम मुहम्मदﷺ रखा। आपके वालिद (अब्बाहुजूर) हज़रत अब्दुल्लाहؓ का पहले ही वफ़ात हो चुका था।
571 से 576ई. तक आपकी परवरीश हज़रत हलीमा सादियाؓ के पास हुई, जो आपकी रज़ाई मां हैं। रज़ाई बहन ‘शीमा’ के साथ आपका बचपना गुज़रा। इसी दौरान ‘सक्के सद्र’ का वाक्या भी गुज़रा।
577ई. आप अपनी वालदा (अम्मीहुज़ूर) हज़रत आमनाؓ और उम्मे ऐमन के साथ मदीना तशरीफ ले गए। लौटते वक्त आपकी मां का विसाल हो गया। यतीम होने की वजह से आप बचपन से मेहनत व मजदूरी करने लगे। मां की वफात के बाद आपकी परवरिश की जि़म्मेदारी आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब पर आ गई। लेकिन दो साल बाद यानी
579ई. को आपके दादा का भी विसाल हो गया। दादा के बाद चचा अबूतालिबؓ ने आपकी परवरिश की जि़म्मेदारी ली, जिनको आपसे बहुत लगाव था। जहां भी जाते आपको साथ ले जाते, आपको अपनी आंख से दूर नहीं होने देते।
583ई. बेपनाह मुश्किलात, तन्हाई और जि़म्मेदारी के एहसास ने आपको वक़्त से पहले ही समझदार और मज़बूत बना दिया। इसी वजह से बारह साल की उम्र में ही आपको, आपके चचा अबूतालिबؓ अपने साथ मुल्क शाम के तिजारती सफ़र में ले गए। वहां एक ऐसे आलिम से मुलाकात हुई जो तौरेत व इंजील में आपकी निशानियों के बारे में पढ़ चुके थे। वो आपको देखते ही पहचान गए। (तिरमिज़ी)
589ई. अरबियों में लड़ाई न करने, अमन अमान कायम करने पर मुआएदा हुआ। जिसमें आप भी शामिल थे।
591ई. तिजारत (व्यापार) के लिए आप मुल्क शाम, बसरा, यमन वगैरह का सफ़र फ़रमाया। उसी ज़माने में लोगों ने आपकी ईमानदारी व सच्चाई से खुश होकर ‘सादिक़’ और ‘अलअमीन’ लक़ब दिए।
594ई. फिर से माले तिजारत लेकर बसरा का सफ़र फ़रमाया।
595ई. आपकी शादी मुबारक हज़रत बीबी खदीजाؓ से हुई।
598ई. आपके साहबजादे हज़रत कासिमؓ की पैदाईश हुई।
600ई. आपके साहबजादे की वफात हो गई। आपकी साहबजादी हज़रत ज़ैनबؓ की पैदाईश हुई।
603ई. आपकी दूसरी साहबजादी हज़रत रूकय्याؓ की पैदाईश हुई।
605ई. आग लगने के साथ साथ बाढ़ के भी आने से काबा में बहुत नुक्सान हो गया। इसके बाद काबा को ढहा कर, नए सिरे से तामीर की गई जिसमें आप भी शामिल रहे।
607ई. हुज़ूरﷺ ज्यादातर वक्त ‘गारे हिरा’ में तन्हा रहते। इबादत, मुजाहिदा, मुराकबा व गौर फि़क्र में डुबे रहते।
610ई. गारे हिरा में हज़रत जिब्रईलؑ तशरीफ़ लाते हैं और आपसे कहते हैं. ‘इक़रा’ यानी पढ़ो। आपने कहा मुझे पढ़ना नहीं आता। तो ज़ोर देकर फिर कहा गया. ‘पढ़ो उस रब के नाम से जिसने पैदा किया।’ ये अल्लाह का पहला कलाम था, कुरान की पहली आयत थी, जो आप पर हज़रत जिब्रईलؑ के ज़रीए उतरी थी। पहली ही आयत में ‘इल्म’ और ‘मारफ़त’ की बात कही गई।




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