हज़रत हस्सान बिन साबितؓ फ़रमाते हैं.

व अहसनो मिन्का लम तरा क़त्तो ऐनी
व अजमलो मिन्का लम तलेदिन्नेसाओ
ख़ुलेक़त मुबर्रा.अम.मिन कुल्ले ऐबिन
कअन्नका क़द ख़ुलेक़त कमा तशाओ

हुजूरﷺ  से हसीनतर
मेरी आंख ने कभी देखा ही नहीं
और न कभी किसी मां ने
आपसे जमीलतर पैदा किया है।
आप की तख़लीक़ बेएैब है,
(ऐसा महसूस होता है कि) जैसे
रब ने आपकी ख़्वाहिश के मुताबिक़
सूरत बनाई है।

हज़रत ताहिर उल क़ादरी मद्देजि़ल्लहू फ़रमाते हैं.

हज़रत मूसाؑ खुदा के दीदार की ख्वाहिश रखते हैं और कहते हैं.
ऐ मेरे रब! मुझे (अपना जल्वा) दिखा कि मैं तेरा दीदार कर लूं।
(कुरान 7:143)

कभी ऐ हक़ीक़ते मुन्तिज़र! नज़र आ लिबासे मजाज़ में।
कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मेरी जिबीने नियाज़ में।

फिर क्या हुआ, एक जल्वा दिखा और पहाड़ के टुकड़े टुकड़े हो गए
और हज़रत मूसाؑ बेहोश हो गए।
होश में आकर कहते हैं, तुझसा कोई नहीं।
हरीमे नाज़ से सदा आती है, ऐ हुस्नो जमाल की तलाश करने वाले! तेरी तलाश पूरी हो चुकी है।

यूं तो हर तरफ़ रब के ही हुस्न का जल्वा है…
तुम जिधर भी रूख करो उधर ही अल्लाह की तवज्जो है।
(यानी हर सिम्त अल्लाह ही की ज़ात जल्वागर है।)
(कुरान 2:115)

लेकिन महबूबﷺ  का हुस्न, सारे ख़ल्क़ में आला है।
और महबूबﷺ  की ज़ाते अक़दस पर रब का हुस्न शबाब पर है।

तेरे जमाल से बढ़कर कोई जमाल नहीं।
तु बेमिसाल है तेरी कोई मिसाल नहीं।

कहते हैं सूरत दरअस्ल सीरत का आईना होती है।
ज़ाहिरी सूरत देख कर इन्सान के सीरत का बहुत कुछ अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

जब हुज़ूरﷺ  की मिसाल सीरत में नहीं मिलती तो फिर हुज़ूरﷺ  की हुस्नो जमाल कैसा होगा?

हुस्ने युसफू, दमे ईसा, यदे बैज़ा दारी।
आंचा खूबां हमा दारंद तु तन्हादारी।

हुज़ूरﷺ  की ज़ात, हुस्नो कमाल की वो शाहकार है, कि
कायनात के सारी खुबसूरती उसके सामने ग़रीब है।
दुनिया की सारी रानाइयां आप ही के दम से है।
हुज़ूरﷺ  के हुस्न के सामने चांद भी फीका है।
और आपके चेहरे में वो ताब व जलाल है कि
सहाबियों की जी भर के देखने की हिम्मत भी नहीं होती।

रब ने आपको वो हुस्नो जमाल अता फ़रमाया है कि अगर उसका ज़हूर एक साथ हो जाए
तो इन्सानी आंख में ताब नहीं कि उन जल्वों को देख सके।

लेकिन रब है कि हुजूरﷺ  को तकता रहता है…
हम तो आपकी तरफ़ से निगाहें हटाते ही नहीं हैं और हम हर वक़्त आप ही को तकते रहते हैं।
(कुरान 52:48)

एक सूफ़ी का फ़रमाते है-

अक्सर लोगों ने रब का इरफ़ान तो हासिल कर लिया
लेकिन हुज़ूरﷺ  का इरफ़ान उन्हें हासिल नहीं हो सका,
क्योंकि बशरियत के परदे ने उनकी आंखें ढक दी थीं।

हदीस के मुताबिक,

हुज़ूरﷺ  की हक़ीक़त खुदा के अलावा कोई नहीं जानता।

खुदा की ग़ैरत ने डाल रखे हैं तुझ पे सत्तर हज़ार परदे।
जहां में लाखों ही तूर बनते जो इक भी उठता हिजाब तेरा।