हजरत मुहम्‍मद सल्‍लल्‍लाहोअलैहेवसल्‍लम पर सलातो सलाम का नजराना पेश करना एक तरह से बुलन्‍द दरजात की दुआ है।
तो क्‍या हुज़ूरे अकरम सल्‍लल्‍लाहोअलैहेवसल्‍लम हमारी दुआ के मोहताज हैं?

क्‍या हमारी दुआ से उनके दरजात बुलन्‍द होते हैं?
बिल्‍कुल नहीं।

उनके दरजात बुलन्‍द करने की हमारी क्‍या औकात,
जिनका नूर तख्‍लीके कायनात के पहले बनाया गया,
जो तमाम अम्बिया अलैहीस्‍सलाम के सरदार हैं,
जिनपर खुद रब्‍बुल आलमीन दरूद भेजता है।
हमारी दुआ के बगैर भी उनका दरजा अल्‍लाह के बाद सबसे उपर है।
हुज़ूरे अकरम सल्‍लल्‍लाहोअलैहेवसल्‍लम किसी उम्‍मती के दुआ के मोहताज नहीं हैं।

तो फिर हम दरूदो सलाम क्‍यों भेजते हैं।
हुज़ूरे अकरम सल्‍लल्‍लाहोअलैहेवसल्‍लम पर दरूदो सलाम भेजने के दो मकसद हैं-

1.    जि़क्र बुलन्‍द करना
अल्‍लाह ने क़ुरआन में फरमाया
وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ
और हमने आप की खातिर आपका जिक्र (अपने जिक्र के साथ मिलाकर दुनिया व आखिरत में हर जगह) बुलन्‍द फरमा दिया
(कुरआन-94सूरे अश्‍श्‍ारह-4)
अल्‍लाह ने हुज़ूरे अकरम सल्‍लल्‍लाहोअलैहेवसल्‍लम का जिक्र ताकयामत बुलन्‍द कर दिया है
और हम वो जिक्र करके अल्‍लाह के उस फरमान के शाहिद व गवाह हैं।

2.    शुक्र अदा करना
لَقَدْ مَنَّ ٱللَّهُ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًۭا مِّنْ أَنفُسِهِمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتِهِۦ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَإِن كَانُوا۟ مِن قَبْلُ لَفِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍ

बेशक अल्‍लाह ने मुसलमानों पर बड़ा एहसान फरमाया कि उनमें उन्‍हीं में से (बड़ी अज़मत वाले) रसूल (सल्‍लल्‍लाहोअलैहेवसल्‍लम) भेजा, जो उन पर उसकी आयतें पढ़ते और उन्‍हें पाक करते है और उन्‍हें किताब व हिकमत की तालीम देते हैं, अगरचे वो लोग इससे पहले खुली गुमराही में थे।
(कुरआन-3आलेइमरान-164)
यानी हुज़ूरे अकरम सल्‍लल्‍लाहोअलैहेवसल्‍लम की विलादत भी हम पर एहसान है।
जब कोई एहसानमंद, एहसान का सिला नहीं दे पाता तो एहसान करने वाले के हक में दुआ व शुक्र अदा करता है।
दरूदो सलाम भी हुज़ूरे अकरम सल्‍लल्‍लाहोअलैहेवसल्‍लम के बेहिसाब एहसानात का अदना (छोटा) सा शुक्र है।
हम उनके एहसानों का सिला तो नहीं दे सकते लेकिन शुक्र तो अदा कर सकते हैं।




अलहमदु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन,वस्सलातु वस्सलामु अला आलिहि व असहाबिहि अजमईन


कसरत से दुरूद शरीफ पढ़ना दर्जात की बुलंदी और गुनाहों की माफी का सबब है


अल्लाह तआला कुरआन करीम में इरशाद फ़रमाता हैः


“अल्लाह तआला नबी पर रहमतें नाज़िल फ़रमाता है और फरिश्ते नबी के लिए दुआए रहमत करते हैं, ऐ ईमान वालों! तुम भी नबी दरूद व सलाम भेजा करो।” 

(सूरह अल-एहज़ाब: 56) 


इस आयत में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उस मक़ाम का बयान है जो आसमानों में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को हासिल है और वो ये है कि अल्लाह तआला फरिश्तों में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़िक्र फ़रमाता है और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर रहमतें भेजता है और फरिश्ते भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दरजात की बुलंदी के लिए दुआएँ करते हैं। 


इसके साथ अल्लाह तआला ने ज़मीन वालों को हुक्म दिया कि वो भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद व सलाम भेजा करें। हदीस में आता है कि जब ये आयत नाज़िल हुई तो सहाबा-ए-किराम ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह सलाम का तरीक़ा तो हम जानते हैं। (यानी नमाज़ में अस्सलामु अलइका अय्युहन्नबिय्यु, पढ़ना) हम दरूद किस तरह पढ़ें? इस पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दरूद इब्राहीम बयान फ़रमायाजो नमाज़ में अत्तहीय्यात पढ़ने के बाद पढ़ा जाता है। (सही बुख़ारी)


वज़ाहत: अल्लाह तआला का नबी पर दरूद भेजने का मतलब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर रहमतें नाज़िल करना और फरिश्तों में उनका ज़िक्र फ़रमाना है। फरिश्तों या मुसलमानों का आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दरूद भेजने का मतलब आप पर रहमत नाज़िल करने और बुलंद दर्जात के लिए अल्लाह तआला से दुआ करना है।


हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बानी दरूद शरीफ पढ़ने के फज़ाएल:


जिसने मुझ पर एक मर्तबा दरूद भेजा, अल्लाह तआला उस पर दस रहमतें नाज़िल फ़रमाएगा। (मुस्लिम) 


जिसने मुझ पर एक मर्तबा दुरूद भेजा, अल्लाह तआला उस पर दस रहमतें नाज़िल फ़रमाएगा, उसके दस गुनाह माफ फ़रमाएगा और उसके दस दर्जे बुलंद फ़रमाएगा। (नसई)


दरूद शरीफ पढ़ने वाले के ख़ुलूस व तक़वे की वजह से दरूद शरीफ पढ़ने का सवाब अहादीस में मुख़तलिफ ज़िक्र किया गया है। जो शख़्स मुझ पर ब कसरत दरूद भेजता है, क़यामत के रोज़ सबसे ज़्यादा मेरे क़रीब होगा।(तिर्मिज़ी) 


कसरत से दरूद भेजना सगीरा गुनाहों की मआफ़ी का सबब बनेगा। (तिर्मिज़ी)