मौलाना जामीؓ फ़रमाते हैं.


रब की याद की लज़्ज़त यूं हासिल की जाए कि हर वक्त और हर हाल में यानि आते और जाते हुए, खाते और सोते हुए, बोलते और सुनते हुए भी तुझे हक से अपनी वाबस्तगी का पूरा पूरा एहसास हो।

मुख़्तसर यह कि हालते आराम और काम काज करते हुए भी तुझे होशियार होना चाहिए ताकि इस वाबस्तगी के मामले मे ग़फ़लत व लापरवाही का शक़ तक भी न गुज़र सके और इस तरह तुझे अपने एक एक सांस से भी हिसाब लेना पड़ेगा कि कहीं वो यादे इलाही से खाली तो नहीं।

चेहरा तेरा देखे हुए गुज़रे कई साल।
फिर भी तेरी उल्फ़त को नहीं ख़ाफे़ ज़वाल।
जिस हाल में भी चाहूं, जहां जाके रहूं।
आंखों में है तू दिल में भी है, तेरा ख़याल।