मुरशिद-ए-कामिल (सच्‍चे गुरू) की जरूरत इसी बात से पता चलती है कि कुरआन को कुरआन इसलिए मानते हैं क्‍योंकि उसकी सारी आयतें, बिना किसी शक के अल्‍लाह की बयानकर्दा मानते हैं, हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) की हदीस को इसलिए मानते हैं क्‍योंकि वो मोअतबर सनदों (भरोसेमंद प्रमाणों) के साथ मौजूद है। ठीक इसी तरह किसी रूहानी मुर्शिद (आध्‍यात्मिक गुरू) का क़ल्‍ब (हृदय) वास्‍ते ब वास्‍ते हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) से मिला होता है। सूफ़ीयों का गिरोह ही वो तीसरा गिरोह है जो हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के सच्‍चे वारिस हैं। इस गिरोह का सिलसिलाए रूहानी भी जंजीर की मजबूत कड़ीयों जैसा है जिसका सरचश्‍म-ए-तक़दीस (शुद्ध स्‍त्रोत) हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) का दिल है।


जिस खुबसूरती से इमाम बुखारी व मुस्लिम ने हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के कलाम व सहाबियों की बातों को किताबों व तहरीरों में दर्ज किया, उसी खुबसूरती से हसन बसरी (र.अ.) व जुनैद बगदादी (र.अ.) ने अल्‍लाह के पोशीदा बातों, हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) की चमक व सहाबियों के अमल से अपने सीनों (दिलों) को आबाद किया। एक तरफ बातें दर्ज हो रही थी सफीनों में तो एक तरफ मुन्‍तकिल (प्रवाहित) हो रही थी सीनों में। इन दोनों का तअल्‍लुक ज़ाते मुहम्‍मदी से ही है और सहा‍बी इन दोनों के दरमियान कड़ी हैं। 


सहाबियों में भी कुछ ख़ास के हिस्‍से में ये खुशनसीबी आई, उनमें हज़रत अबुबक्र, उमर फारूक, उसमान गनी, मौला अली, हारिसा, अबुजरगफारी, सलमान फारसी, अबुउबैदा, अबुदरदा, मआज इब्‍नेजबल, अबुहुरैरह, अबुमूसा अश्‍अरी, इमरान बिनहसीन वगैरह के नाम खासतौर पर जो पहले सूफ़ी हजरात हैं। सूफ़ीयों के सारे रूहानी सिलसिले (आध्‍यात्मिक शाख) हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) से शुरू होकर इन्‍हीं नामों से गुजरते है।