उम्मत की ज़िम्मेदारी। (Responsibility of Ummat)



खातिमूल अम्बिया सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आखिरी नबी होने के सबब ये उम्मत आखिरी उम्मत है, इसी उम्मत के अफराद की जिम्मेदारी है कि वो कयामत तक आने वाले इंसान की सही रहबरी करे जिससे वो हकीकी खालिक को पहचाने और उसकी मान कर जिंदगी गुजारे|


ये ही वजह है के ये उम्मत इबलीस और इसके तमाम चेलो और इनकी फौजो के हमलो का वाहिद निशाना है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात से अब तक आलमी सतह पर इबलीस और इसकी फौज के हमलो और उम्मत के अंदर पैदा होने वाली कमजोरीयो, कोताहीयो के नतीजे मे उम्मत मुसलसल टूटती बिखरती और कमजोर होती चली गई|

उम्मत का ये हाल आज अपनी आखिरी हदो को पार कर रहा है, चुनांचे उम्मत इस वक्त दो अजीम मसाइल मे घिरी हुई है। आलमी सतह से मकामी सतह तक उम्मत हर तरह के अहले कायदीन से लगभग खाली हो चुकी है, खासकर तीन पहलूओ और जिंदगी के हिस्सो मे अहले कायदीन बयां हद तक खाली हो चुकी है, कायदीन के तीन पहलू ये है।

आला तरीन सतह से अदना तरीन सतह तक उम्मत अहले कायदीन से खाली हो चुकी है, मुसलमानो पर हुकूमत करने वाले हुक्मरान इमान, नेक आमाल, इमानी जज्बे से महरूम हो चुके है, जिसका नतीजा ये हुआ के वो मुस्लिम हुक्मरान के मकसद हुक्मरानी, आदाब हुक्मरान, हुकूमत करने का सलीका से महरूम हो चुके है|

गोया कि वो जमाना आ गया है जिसकी खबर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यू दी थी" "तुम पर ऐसे हुक्मरान बनेगे जो मजूसियो (आतिश परस्तो) से भी बदतर होगे।

उम्मत की ज़िम्मेदारी। (Responsibility of Ummat)
आज अगर ये सवाल मुसलमानों से पूछा जाये कि उम्मत की ज़िम्मेदारी क्या है, तो मालूम नहीं कितने मुस्लमान इसका सही जवाब दे सकेगें। इससे पहले हम ये समझें कि अल्लाह ने हमारी यानि उम्मत की ज़िम्मेदारी क्या बताई है, उससे पहले मुख़्तसर ये जान लें की उम्मत किसे कहते हैं। उम्मत एक तंज़ीम(organization) को कहते हैं। हर तंज़ीम अफ़राद (individuals / members ) से मिलकर बनती है और हर तंज़ीम का एक मक़सद होता है। इस तंज़ीम में शामिल अफ़राद अपनी निजी ज़िन्दगी में एक दूसरे से अलग होते हैं, लेकिन तंज़ीम के मक़सद पर सब एक जूट हो जाते हैं। साथ इस बात को भी ज़हन में रखें कि जो अफ़राद तंज़ीम में शामिल होने के बाद भी उसका मक़सद पूरा करने के लिए नहीं लगते उन्हें तंज़ीम की फेहरिस्त से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
आईये अब जानते हैं अल्लाह ने इस तंज़ीम यानि उम्मत का क्या मक़सद या ज़िम्मेदारी बताई है।
كُنْتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَتُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ
तुम सबसे बेहतरीन उम्मत हो जिसे इंसानों के लिए लाया गया है (क्योंकि) तुम नेकी का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो…(3:110)
उम्मतें रसूलों से बनती है, इसे पहले भी बहुत सी उम्मतें गुज़री। लेकिन अब तुम सबसे बेहतरीन उम्मत (ख़ैर-ए-उम्मत) हो, सबसे बेहतरीन इसलिए क्योंकि तुम्हें दुनिया के इंसानों के फायदे के लिए लाया गया है,  जिसका मक़सद और ज़िम्मेदारी इंसानों की भलाई और फायदे के बारे में सोचना है। और अगर दुनिया के इंसानों के फायदे और भलाई के बारे में नहीं सोचा तो क्या हम ख़ैर-ए-उम्मत रहेंगे? क्या वो शख़्स उम्मत में शामिल है जो इंसानों की भलाई और फायदे के बारे में नहीं सोचता? आज हमने दुनिया के इंसानों की भलाई के बारे में सोचना छोड़ दिया इसलिए हमारे सामने ऐसे हालत हैं जो हमारी दुर्दशा का सबब हैं।
अपनी नमाज़ें ज़रूर पढ़िए, रोज़े ज़रूर रखिये, यह फ़र्ज़ हैं, लाज़िम और ज़रूर हैं, लेकिन ये हमारी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारियाँ (individual responsibilities) हैं, जैसा की क़ुरआन ने कहाँ:
وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ
मैंने जिनों और इंसानों को इसी ग़रज़ से पैदा किया कि वह मेरी इबादत करें। (51:56)
ये हमारी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारियाँ हैं, इसके साथ हमारी सामूहिक जिम्मेदारी (collective responsibility) भी है उम्मती होने की हैसियत से और इस उम्मत को इंसानों के लिए लाया गया है। तुम्हें दुनिया के इंसानों के लिए फ़ायदेमंद बनना है, अगर दुनिया के इन्सानों को फ़ायदा पहुंचोगे तभी ज़मीन पर बाक़ी रहोगे, क़ुरआन ने कहा:
وَأَمَّا مَا يَنْفَعُ النَّاسَ فَيَمْكُثُ فِي الْأَرْضِ
जो दुनिया के इंसानों के लिए नफ़ा बख़्श होता है वो ज़मीन में ठहर जाता है…(13:17)
मुस्लमान क्या नफ़ा बख़्श हैं दुनिया के इंसानों के लिए? ये काफ़ी नहीं है कि लोगो को हमसे नुक़सान न हो बल्कि हमसे दुनिया को फ़ायदा और रहमत (करुणा) पहुचनी चाहिए। जान लीजिये रहमत ख़ुश्बू की तरह होती है जिसे छुपाया नहीं जा सकता। इसी तरह नफ़ा भी छुपाया नहीं जा सकता।
Responsibility of Ummat:
अपने उम्मत होना का फ़र्ज़ समझें और दुनिया के इंसानों को फ़ायदा पहुंचने वाले बने, हालत बदलेंगे, ज़रूर बदलेंगे।

जब तक कोई क़ौम अपने सोचने का अंदाज़ नहीं बदलती, तब तक उसके हालात में तबदीली नहीं आती!
ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْ
बेशक किसी क़ौम के पास जो कुछ होता है अल्लाह उससे तब्दील नहीं करता जब तक वे अपनी नफ़सियात को नहीं बदलते… (13:11 )
आज हमारी हालत ये हो चुकी है की हमने अल्लाह और उसके रसूल की इताअत को छोड़ कर अपने-अपने फ़िरक़ो की फरमाबरदारी शुरू कर दी है। ये कोई छुपी हुयी बात नहीं की हमारा यही रवैया इस बात का ज़िम्मेदार है जिसकी वजह से हमारी हवा उखड़ चुकी है।
क़ुरआन ने तो बहुत साफ़ अल्फ़ाज़ों में इसके बारे में बताया, लेकिन क़ुरआन खोलने की ज़रुरत ही क्या है जब हमने इतने फ़िरक़े बना ही लिए हैं –
وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَنَازَعُوا فَتَفْشَلُوا وَتَذْهَبَ رِيحُكُمْ
और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो और आपस में न झगड़ो वरना बुदज़िल हो जाओगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी… (8:46 )
 هُوَ سَمَّاكُمُ الْمُسْلِمِينَ
उसने तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा (22:78)
जब सबसे पहला फ़िरक़ा बना तो कुछ लोग शिया हुए और कुछ सुन्नी! क्या आप बता सकते हैं रसूलल्लाह शिया थे या सुन्नी? अबूबकर, उमर, उस्मान, अली शिया थे या सुन्नी? जब वह शिया थे न सुन्नी तो हम फ़िरक़ो में क्यों बट गए? और ऐसे बाटे कि इसके बग़ैर दीन मुकम्मल नहीं होता, ऐसे बाटे कि एक दूसरे को दीन से निकलने से भी पीछे नहीं हटते!
फ़िरक़े ख़त्म करें, इस्लाम में आये, अपने आपको मुस्लिम कहें क्यूंकि अल्लाह ने हमारा नाम मुस्लिम रखा है।



जिस दिन हम आपने सोचने का अंदाज़ बदलेंगे हमारे हालात भी बदलेंगे!

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